दीदार इलाही:
दुनिया की जिन्दगी में अल्लाह का दीदार नबी के लिए खास है और आख़िरत में हर सुन्नी मुसलमान के लिए मुमकिन बल्कि वाकेअ, रहा कलबी दिदार या ख्वाब में, यह दीगर अंबिया बल्कि औलिया के लिए भी हासिल है हमारे इमामे आज़म को ख्वाब में 100सौ बार ज़ियारत हुई।
उसका दिदार बेला कैफ है,यानी देखेंगे और यह नहीं कह सकते हैं कि कैसे देखेंगे ।जिस चीज को देखतें हैं उससे कुछ फासला मुसाफत का होता है नज़दीक या दूर ,वह देखने वाले से किसी जेहत में होती है ,उपर नीचे, दाहिने या बाएं, आगे या पीछे,उसका देखना इन सब बातों से पाक होगा ।फिर रहा यह क्यु कर होगा ?
यही तो कहा जाता है कि क्यु कर को यहां दखल नहीं ।
इन शा अल्लाह जब देखेंगे उस वक़्त बता देंगे ।
उसकी सब बातों का खुलासा यह है कि जहां तक अक्ल पहुंचती है ,वह खुदा नहीं ,और जो खुदा है उस तक अक्ल रसा नहीं ।
और वक़्ते दिदार निगाह उसका इहाता करे यह मुहाल है ।
दुनिया की जिन्दगी में अल्लाह का दीदार नबी के लिए खास है और आख़िरत में हर सुन्नी मुसलमान के लिए मुमकिन बल्कि वाकेअ, रहा कलबी दिदार या ख्वाब में, यह दीगर अंबिया बल्कि औलिया के लिए भी हासिल है हमारे इमामे आज़म को ख्वाब में 100सौ बार ज़ियारत हुई।
उसका दिदार बेला कैफ है,यानी देखेंगे और यह नहीं कह सकते हैं कि कैसे देखेंगे ।जिस चीज को देखतें हैं उससे कुछ फासला मुसाफत का होता है नज़दीक या दूर ,वह देखने वाले से किसी जेहत में होती है ,उपर नीचे, दाहिने या बाएं, आगे या पीछे,उसका देखना इन सब बातों से पाक होगा ।फिर रहा यह क्यु कर होगा ?
यही तो कहा जाता है कि क्यु कर को यहां दखल नहीं ।
इन शा अल्लाह जब देखेंगे उस वक़्त बता देंगे ।
उसकी सब बातों का खुलासा यह है कि जहां तक अक्ल पहुंचती है ,वह खुदा नहीं ,और जो खुदा है उस तक अक्ल रसा नहीं ।
और वक़्ते दिदार निगाह उसका इहाता करे यह मुहाल है ।
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