तक़दीरः
अल्लाह तआला के इल्म में,जो कुछ आलम में होने वाला था और जो कुछ बंदे करने वाले थे उसको अल्लाह तआला ने पहले ही जान कर लिख लिया।
किसी कि किस्मत में भलाई लिखी और किसी कि किस्मत में बुराइ लिखी ,इस लिख देने ने बंदा को मजबूर नहीं किया कि जो अल्लाह तआला ने लिख दिया वह बंदा को मजबूरन करना पड़ता है बल्कि बंदा जैसा करने वाला था वैसा ही उसने लिख दिया ,किसी आदमी की किस्मत में बुराइ लिखी तो इसलिए के यह आदमी बुराइ करने वाला था अगर यह भलाई करने वाला होता तो उसकी किस्मत में भलाई ही लिखता,अल्लाह तआला के इल्म ने या अल्लाह तआला के लिख देने ने किसी को मजबूर नहीं करदिया।
तक़दीर के मसअले में ग़ौर व बहस मना है बस इतना समझ लेना चाहिए कि आदमी पत्थर की तरह बिल्कुल मजबूर नहीं है के उसका इरादा कुछ हो ही नहीं बल्कि अल्लाह तआला ने आदमी को एक तरह का इख़्तियार दिया है के एक काम चाहे करे चाहे न करे ,इसी इख़्तियार कि बिना पर नेकी बदी की निस्बत बंदे की तरफ है अपने आप को बिल्कुल मजबूर या बिल्कुल मुखतार समझना दोनों गुमराही है ।
बुरे काम की निस्बत किस की तरफ की जाए ?
बुरा काम कर के यह न कहना चाहिए बे अदबी है कि खुदा ने चाहा तो हुआ ,तकदीर में था किया,बल्कि हुक्म यह है कि अच्छे काम को कहे खुदा की तरफ से हुआ और बुरे काम को अपने नफस की शरारत शामत जानें ।
कज़ा तीन किस्म है:
1,मुबरम हक़ीक़ी :के इल्मे इलाही में किसी शै पर मुअललक़ नहीं ।
2,और मुअललक़े महज़:के सुहुफे मलाइका में किसी शै पर उसका मुअललक़ होना जाहिर फरमा दिया गया है ।
3,और मुअललक़ शबीह ब मुबरम,:के सुहुफे मलाइका में उसकी ताअलीक़ मजकूर नहीं और इल्मे इलाही में ताअलीक़ है ।
वह जो मुबरम हक़ीक़ी है उसकी तब्दील नामुमकिन है अकाबिर महबुबाने खुदा अगर इतेफाकन इस बारे में कुछ अर्ज करते हैं तो उन्हें इस खयाल से वापस फरमा दिया जाता है ।
मलाइका क़ौमे लूत पर अजाब लेकर आए ,सय्यदोना इब्राहीम के रह़मते महज़ा थे ,उनका नामे पाक ही इब्राहीम है यानी अबे रहीम,मेहरबान बाप ,उन काफिरों के बारे में इतने साई हुए के अपने रब से झगड़ ने लगे उनका रब फरमाता है :हम से झगड़ लगा क़ौमे लूत के बारे में ।
यह कुरआन अज़ीम उन बेदिनों का रद फरमाया जो महबुबाने खुदा कि बारगाहे इज्जत में कोइ इज्जत व जाहत नहीं मानते और कहते हैं कि उसके हुजूर कोइ दम नहीं मार सकता,हालांकि उनका रब उनकी वजाहत अपनी बारगाह में जाहिर फरमा ने को खुद इन लफ़्ज़ों से जिक्र फरमाता है :हम से झगड़ लगा क़ौमे लूत के बारे में ।हदीस में है शबे मेराज हुजूर ने एक आवाज़ सुनी के कोइ शख्स अल्लाह के साथ बहुत तेजी और बुलंद आवाज से बात कर रहा है हुजूर ने जिबरील से दरयाफत फरमाया :कि यह कौन है?अर्ज कि मूसा, क्या अपने रब पर तेज़ हो कर गुफतगू करते हैं?
अर्ज की उनका रब जानता है कि उनके मिज़ाज में तेज़ी है ।जब यह आयत करिमा नाजिल हुई कि बेशक़ अनकरिब तुम्हे तुम्हारा रब इतना अता फरमाएगो के तुम राज़ी हो जाओगे ।
हुजूर ने फरमाया :ऐसा है तो मैं राज़ी न हूंगा,अगर मेरा एक उम्मती भी आग में हो।
यह तो शानें बहुत रफिअ है,जिन पर रिफअत व जाह व इज्जत खत्म है ।
मुसलमान मां बाप का कच्चा बच्चा जो हमल से गिर जाता है उसके लिए इरशाद फरमाया:
रोज़े कयामत अल्लाह से अपने मां-बाप कि बख्शीश के लिए ऐसे झगड़ेगा जैसा कर्ज खाह किसी कर्ज दार से यहां तक कि फरमा या जाएगा ।ऐ कच्चे बच्चे अपने रब से झगड़ने वाले अपने मां-बाप का हाथ पकड़ ले और जन्नत में चला जा ।
छैर यह तो जुमला मुअतरेजा था मगर इमान वालों के लिए बहुत नाफेअ और शयातिन अलइंस खुबासत का दाफेअ था,कहना यह है कि क़ौमे लूत पर अजाब कजाए मुबरम हक़ीक़ी था खलिल अल्लाह इस में झगड़े तो उनसे इरशाद हुआ ऐ इब्राहीम इस खयाल में न पड़ो ,बेशक उनपर वह अजाब आने वाला है जो फिरने का नहीं ।और वह जी जाहिर कजाए मुअललक़ है उस तक अक्सर औलिया की रसाई होती है ,उनकी दुआ से, उनकी हिम्मत से टल जाती है और जो मुतअससित हालत में है,जिसे सुहुफे मलाइका के ऐतबार से मुबरम भी कह सकते हैं ,उस तक खवास अकाबिर की रसाई होती है ,
हुजूर गौसे आज़म इसी को फ़रमाते हैं:मैं कजाए मुबरम को रद कर देता हूँ ।और इसी कि निस्बत हदीस में इरशाद हुआ:बेशक़ दुआ कजाए मुबरम को टालदेती है ।
अल्लाह तआला के इल्म में,जो कुछ आलम में होने वाला था और जो कुछ बंदे करने वाले थे उसको अल्लाह तआला ने पहले ही जान कर लिख लिया।
किसी कि किस्मत में भलाई लिखी और किसी कि किस्मत में बुराइ लिखी ,इस लिख देने ने बंदा को मजबूर नहीं किया कि जो अल्लाह तआला ने लिख दिया वह बंदा को मजबूरन करना पड़ता है बल्कि बंदा जैसा करने वाला था वैसा ही उसने लिख दिया ,किसी आदमी की किस्मत में बुराइ लिखी तो इसलिए के यह आदमी बुराइ करने वाला था अगर यह भलाई करने वाला होता तो उसकी किस्मत में भलाई ही लिखता,अल्लाह तआला के इल्म ने या अल्लाह तआला के लिख देने ने किसी को मजबूर नहीं करदिया।
तक़दीर के मसअले में ग़ौर व बहस मना है बस इतना समझ लेना चाहिए कि आदमी पत्थर की तरह बिल्कुल मजबूर नहीं है के उसका इरादा कुछ हो ही नहीं बल्कि अल्लाह तआला ने आदमी को एक तरह का इख़्तियार दिया है के एक काम चाहे करे चाहे न करे ,इसी इख़्तियार कि बिना पर नेकी बदी की निस्बत बंदे की तरफ है अपने आप को बिल्कुल मजबूर या बिल्कुल मुखतार समझना दोनों गुमराही है ।
बुरे काम की निस्बत किस की तरफ की जाए ?
बुरा काम कर के यह न कहना चाहिए बे अदबी है कि खुदा ने चाहा तो हुआ ,तकदीर में था किया,बल्कि हुक्म यह है कि अच्छे काम को कहे खुदा की तरफ से हुआ और बुरे काम को अपने नफस की शरारत शामत जानें ।
कज़ा तीन किस्म है:
1,मुबरम हक़ीक़ी :के इल्मे इलाही में किसी शै पर मुअललक़ नहीं ।
2,और मुअललक़े महज़:के सुहुफे मलाइका में किसी शै पर उसका मुअललक़ होना जाहिर फरमा दिया गया है ।
3,और मुअललक़ शबीह ब मुबरम,:के सुहुफे मलाइका में उसकी ताअलीक़ मजकूर नहीं और इल्मे इलाही में ताअलीक़ है ।
वह जो मुबरम हक़ीक़ी है उसकी तब्दील नामुमकिन है अकाबिर महबुबाने खुदा अगर इतेफाकन इस बारे में कुछ अर्ज करते हैं तो उन्हें इस खयाल से वापस फरमा दिया जाता है ।
मलाइका क़ौमे लूत पर अजाब लेकर आए ,सय्यदोना इब्राहीम के रह़मते महज़ा थे ,उनका नामे पाक ही इब्राहीम है यानी अबे रहीम,मेहरबान बाप ,उन काफिरों के बारे में इतने साई हुए के अपने रब से झगड़ ने लगे उनका रब फरमाता है :हम से झगड़ लगा क़ौमे लूत के बारे में ।
यह कुरआन अज़ीम उन बेदिनों का रद फरमाया जो महबुबाने खुदा कि बारगाहे इज्जत में कोइ इज्जत व जाहत नहीं मानते और कहते हैं कि उसके हुजूर कोइ दम नहीं मार सकता,हालांकि उनका रब उनकी वजाहत अपनी बारगाह में जाहिर फरमा ने को खुद इन लफ़्ज़ों से जिक्र फरमाता है :हम से झगड़ लगा क़ौमे लूत के बारे में ।हदीस में है शबे मेराज हुजूर ने एक आवाज़ सुनी के कोइ शख्स अल्लाह के साथ बहुत तेजी और बुलंद आवाज से बात कर रहा है हुजूर ने जिबरील से दरयाफत फरमाया :कि यह कौन है?अर्ज कि मूसा, क्या अपने रब पर तेज़ हो कर गुफतगू करते हैं?
अर्ज की उनका रब जानता है कि उनके मिज़ाज में तेज़ी है ।जब यह आयत करिमा नाजिल हुई कि बेशक़ अनकरिब तुम्हे तुम्हारा रब इतना अता फरमाएगो के तुम राज़ी हो जाओगे ।
हुजूर ने फरमाया :ऐसा है तो मैं राज़ी न हूंगा,अगर मेरा एक उम्मती भी आग में हो।
यह तो शानें बहुत रफिअ है,जिन पर रिफअत व जाह व इज्जत खत्म है ।
मुसलमान मां बाप का कच्चा बच्चा जो हमल से गिर जाता है उसके लिए इरशाद फरमाया:
रोज़े कयामत अल्लाह से अपने मां-बाप कि बख्शीश के लिए ऐसे झगड़ेगा जैसा कर्ज खाह किसी कर्ज दार से यहां तक कि फरमा या जाएगा ।ऐ कच्चे बच्चे अपने रब से झगड़ने वाले अपने मां-बाप का हाथ पकड़ ले और जन्नत में चला जा ।
छैर यह तो जुमला मुअतरेजा था मगर इमान वालों के लिए बहुत नाफेअ और शयातिन अलइंस खुबासत का दाफेअ था,कहना यह है कि क़ौमे लूत पर अजाब कजाए मुबरम हक़ीक़ी था खलिल अल्लाह इस में झगड़े तो उनसे इरशाद हुआ ऐ इब्राहीम इस खयाल में न पड़ो ,बेशक उनपर वह अजाब आने वाला है जो फिरने का नहीं ।और वह जी जाहिर कजाए मुअललक़ है उस तक अक्सर औलिया की रसाई होती है ,उनकी दुआ से, उनकी हिम्मत से टल जाती है और जो मुतअससित हालत में है,जिसे सुहुफे मलाइका के ऐतबार से मुबरम भी कह सकते हैं ,उस तक खवास अकाबिर की रसाई होती है ,
हुजूर गौसे आज़म इसी को फ़रमाते हैं:मैं कजाए मुबरम को रद कर देता हूँ ।और इसी कि निस्बत हदीस में इरशाद हुआ:बेशक़ दुआ कजाए मुबरम को टालदेती है ।
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